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क्या ये वर्तमान सोरेन सरकार के अंत की शुरुआत है ??  हेमंत सोरेन की बोलती बंद , सियासी आग में झुलस रहा झारखण्ड ! पढ़िए ये पोलिटिकल स्टोरी

TEAM_JILLATOP : कहते हैँ सबसे अच्छा दोस्त और दुश्मन कोई करीबी हीं हो जाता है l मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के साथ भी कुछ ऐसा हीं हो रहा है l मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के लिए पहले से गले की हड्डी बनी भाजपा तो थीं हीं, उसके बाद बागी हुई कांग्रेस और अब अपनी हीं जेएमएम पार्टी के सीता सोरेन और लोबीन हेमब्रोम भी अपनी हीं सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैँ l जेएमएम विधायक लोबीन हेमब्रोम लगातार कई मुद्दों को उठा कर हेमंत सरकार पर हमलावर बने हुए हैँ l इनमे सबसे प्रमुख स्थानीय और नियोजन नीति और 1932 का खतियान शामिल है l

क्रोनोलॉजी समझिये

बीते दिनों झारखण्ड विधानसभा में बजट सत्र चालू था l सत्र के खत्म होने के बाद विधायक लोबीन हेमब्रोम सदन से बाहर आये और मिडिया से मुख़ातिब होते हुए उन्होंने ऐसा बयान दिया की झारखण्ड की सियासत हिल गई l विधायक लोबीन ने कहा की

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपना कोई वादा पूरा किया l विधानसभा में अपने संबोधन के दौरान हेमब्रोम ने कहा कि झारखंड आज भुगत रहा है और सीएम सोरेन भविष्य में क्या करेंगे, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन उन्हें पहले किए गए वादों को पूरा करने की जरूरत है l मुख्यमंत्री उन्हें कभी भी बोलने का समय नहीं देते आरोपों की बारिश यहीं नहीं थमी, बल्कि बोलते बोलते विधायक लोबीन हेमब्रोम ने यहाँ तक कह डाला की  मुख्यमंत्री ने उन्हें बोलने का मौका नहीं दिया। उन्होंने मुझे बोलने का समय नहीं दिया, मैंने केवल एक बार मुख्य बजट के दौरान बात की है। यह दर्दनाक है। मुझे उम्मीद थी कि सीएम मुझे मौका देंगे, लेकिन उन्होंने नहीं किया … झारखंड में लोग रोजाना विरोध कर रहे हैं, मुझे उनके लिए बोलना है,”

सूबे की सियासत में गरमाए हुए हैँ कई मुद्दे

आये दिन झारखण्ड में नए-नए नारों के साथ के सरकार को जमकर धमकियां दी जा रही हैं l सरकारी नौ‍करियों में मगही, भोजपुरी और अंगिका समेत दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं को हटाने से जहां भाषा विवाद गहराया था वहीं 1932 के खतियान से झारखंडी की परिभाषा गढ़ने और झारखंड स्‍थानीय नीति बनाने पर भी बवाल मचा हुआ है l


1932 खतियान, स्‍थानीय नीति और नियोजन नीति के मसले को सबसे अधिक हवा देने में सतारूढ़ पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा के हीं नेता लोबीन हेमब्रोम का नाम टॉप पर है l  जबकि हेमंत सरकार में शामिल कांग्रेस की हालत सांप-छछूंदर जैसी है। उसे न निगलते बन रहा है, न उगलते l झारखण्ड कांग्रेस का तो स्‍टैंड तक क्लियर नहीं दिख रहा है l कांग्रेस पार्टी वेट एंड वाच वाली सुरक्षात्मक रणनीति पर आगे बढ़ रही है l सरकार में शामिल आरजेडी भी इस पुरे मामले पर कोने में छिपी हुई है l सब अपने लिए सेफ जोन की तलाश कर रहे हैँ l


कांग्रेस -आर जे डी भारी टेंशन में, आगे कुआँ पीछे खाई वाली है हालत

झारखण्ड सरकार में तीन पार्टियां शामिल है l JMM, CONGRESS और RJD l एक तरफ जहाँ झारखण्ड में सियासी अस्थिरता है l ऐसे में एक सवाल ये भी है की इस पुरे पोलिटिकल ड्रामा में सरकार में शामिल कांग्रेस और आरजेडी कहाँ है ?
<span;>सवाल उठना इसलिए भी लाजमी है क्यूंकि जेएमएम की अंदरूनी क्लेश की खबरें तो हर दिन आ रही है लेकिन कांग्रेस और आरजेडी का 1932 खतियान, स्थानीय नीति, नियोजन नीति, जातीय जनगणना, सरना धर्म कोड पर क्या राय है ये बताने वाले एक भी नेता अब तक फ्रंट पर नहीं दिखे हैँ l राज्‍य भर में आंदोलनों का दौर शुरू हो गया है। माना जा रहा है की अगर ये सारी बातें झारखण्ड में लागु हो जाएं तो  झारखंड में रह रहे आदिवासियों को उनका अपना राज्‍य और राज-पाट होने का अहसास तो हो जायेगा लेकिन झामुमोनीत सरकार में शामिल कांग्रेस-राजद के लिए अपने आधार वोटरों  या यूँ कह लें की बिहार से ताल्लुकात रखने वाली समर्थक जनता के हकों की रक्षा करने की जबर्दस्‍त चुनौती भी हो जाएगी l और ये कहना गलत नहीं होगा की शायद इसीलिए दोनों पार्टियां चुप्पी साधने में हीं अपनी भलाई समझ रही है l

आजसू करेगा 14 अप्रैल को जेल भरो अभियान

सियासी पिच पर मैच चले और विकेट लेने की होड़ ना मचे भला ऐसा कैसे हो सकता है l भले हीं चुनावी पारी में आजसू लड़खड़ाई हो लेकिन सुदेश महतो को सही समय पर सही दाव खेलना बखूबी आता है l ऐसा हम इसलिए कह रहे हैँ क्यूंकि कभी भाजपा तो कभी जेएमएम के अचानक से हितैसी हो जाने वाले सुदेश महतो ने जैसे हीं झारखण्ड में चल रहे घमासान को देखा तो उन्होंने भी जनता के भावनाओं पर गूगली डालने की कोशिश की है l बता दें की आजसू 14 अप्रैल को पुरे राज्य में जेल भरो आंदोलन करने वाली है l अपने सात मांगों को लेकर आजसू ये आंदोलन करेगी जिनमे खतियान आधारित स्थानीय एवं नियोजन नीति लागू करने, पिछड़ों को आबादी अनुसार आरक्षण देनेे, जातीय जनगणना कराने, सरना धर्म कोड लागू करने, बेरोजगारों को रोजगार देने, झारखंड आंदोलनकारियों को सम्मान देना आदि शामिल है l शायद पार्टी इन मुद्दों से झारखण्ड की जनता से भावनात्मक रूप से बेहतर तरीके से जुड़ने की कोशिश में लगी है l

अपनी हीं पार्टी से सीता सोरेन भी हैँ नाराज

<span;>सोरेन परिवार से ताल्लुक रखने वाली और जेएमएम की विधायक सीता सोरेन भी पिछले दिनों राजभवन पहुंची हुई थीं l विधायक सीता सोरेन अवैध उतखनन के मुद्दे पर पहुंची बेटी जयश्री के साथ राजभवन पहुंची थीं l बता दें की तथाकथित तौर पर सीता सोरेन पर सरकार गिराने की साजिस के आरोप भी लगाये गए थे l बता दें की राजभवन पहुंचे कर सीता सोरेन ने कहा था की
दुर्गा सोरेन और शिबू सोरेन ने हमेशा आदिवासियों की आवाज उठाई थी. . लम्बी लड़ाई के बाद  झारखण्ड बनाया था लेकिन 21 साल बाद भी जनता उपेक्षित है l  जल जंगल जमीन की बात सब करते हैँ लेकिन ज़ब करने की बारी आती है तो सब पीछे आ जाते हैँ  l सीता सोरेन ने भी मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर गंभीर नाराजगी जताई और कहा की  कई मुद्दों पर मुख्यमंत्री से मिलना होता रहा पर एक भी मुद्दे पर सही जवाब नहीं मिला  l अधिकारीयों के भ्रस्ट होने के बावजूद उनपपर करवाई नहीं होती है  l जिस मकसद के लिए दुर्गा सोरेन ने और शिबू सोरेन ने झारखण्ड बनाया वो नहीं होता दिख रहा है l और अंत में यहाँ तक कह दिया की अपनी सरकार से हीं आस थी..  लेकिन मैं निराश हूं l


बन्ना गुप्ता – रघुवर दास की तस्वीर ने डाला आग में घी

पहली बार झारखंड विधानसभा पहुंचे जमशेदपुर पश्चिमी के कांग्रेस विधायक और  स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन मंत्री बन्ना गुप्ता ने भी बिगुल फूँक दिया है l मंत्री होने के बावजूद बन्ना गुप्ता ने अपने एक बयांन में कहा की अगर उनकी मातृभाषा से समझौता किया जाता है तो वह अपने मंत्री पद से इस्तीफा देने से नहीं हिचकिचाएंगे। उन्होंने कहा कि मैं कैबिनेट मंत्री पद छोड़ने के लिए तैयार हूं और जरूरत पड़ी तो विधायक की सीट भी छोड़ दूंगा। लेकिन, किसी भी सूरत में ‘हिंद’ (देश) और हिंदी (मातृभाषा) से समझौता नहीं करूंगा l
इतने कहने के कुछ देर बाद सियासी अखाड़े में एक दूसरे को पटखनी देने की फिराक में रहने वाली दोनों पार्टियों के नेता की एक तस्वीर वायरल हो जाती है ..  यानि बन्ना गुप्ता और रघुवर दास की l हेमंत सोरेन की सरकार का तख्‍ता पलटने और सत्तारुढ़ दल झामुमो की बगावत की खबरों के बीच सरकार के मंत्री बन्‍ना गुप्‍ता ने पूर्व मुख्‍यमंत्री और भाजपा के राष्‍ट्रीय उपाध्‍यक्ष रघुवर दास के साथ दोस्‍ताना दिखाकर सियासी आग को और भड़का दिया और कयास लगने लगी की क्या ये वर्तमान सोरेन सरकार के अंत की शुरुआत है l


तो क्या गिर जाएगी वर्तमान झारखण्ड सरकार ?

झारखण्ड में सरकार बनने और कार्यकाल पूरा किये बिना सरकार के गिर जाने की कहानी कोई नई नहीं है l झारखण्ड की मिट्टी से निकलने वाली खनिज से आधे भारत के कल कारखाने चलते हैँ लेकिन झारखण्ड अब भी अंधकार में है तो इसका एक कारण झारखण्ड की सियासी अस्थिरता भी है l 2014 में बनी रघुवर सरकार झारखण्ड की पहली सरकार थी जिसने अपने 5 साल का कार्यकाल पूरा किया था l और इस बार की अबुआ सरकार में फिर से वहीं पहले वाली हलचल दिखाई देने लगी है जिससे सरकार गिरने की खबरें फिर से चर्चा में है l वर्तमान सरकार से ना तो कॉंग्रेस के नेता खुश दिखाई दें रहे हैँ… ना आरजेडी  ना खुद सरकार की मुख्य भूमिका में रह रही  जेएमएम के विधायक l यहाँ तक की सोरेन परिवार से ताल्लुक रखने वाली सीता सोरेन भी सरकार और मुख्यमंत्री के कार्यशैली पर सवाल उठा चुकी हैँ l ऐसे में सबसे बड़ा सवाल ये की क्या मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन इन सारी अड़चनो से निपट पाएंगे ? अगर हाँ तो कैसे ? और अगर नहीं तो क्या झारखण्ड की जनता इसका खामियाजा भुगतेगी ? मेनिफेस्टो में किये चुनावी वादों को पूरा ना कर पाने से शुरू हुए इन विवादों पर लगाम कब लगेगी? या बाबूलाल मरांडी की सरकार में जिस तरह इंदरसिंह नामधारी का जो रोल था ठीक उसी  तरह हेमंत सरकार में भी आपसी क्लेश के चलते मुख्यमंत्री को अपनी सरकार और कुर्सी दोनों गवानी पड़ेगी ?

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